घुप अंधेरा.सांय-सांय की आवाजें. गीदड़ों की ‘औं औं’ सांपों की डरावनी फुंकार और मेंढकों की ‘टर्र-टर्र.’ छोटे-छोटे कीड़ों की ‘टर्न-टर्न, कुर्न-कुर्न’ जैसी अजीबो-गरीब आवाजें रात के सन्नाटे को चीरती जरूर, पर भंग न करतीं. न डर कम करतीं.
पर इन सभी बातों से बेखबर रामदुलारी अपने 16 वर्षीय इकलौते बेटे रामगोपाल के साथ मैली-कुचैली रजाई में सिकुड़ी पड़ी थी.
"रामदुलारी. ओ रामदुलारी." अपने नाम की आवाज कान में पड़ते ही उसकी आंखें खुल गईं.
"लगता है आज फिर किसी के तकलीफ हुई है." रामदुलारी बुदबुदाई. फिर क्षोभ में ,"इतनी ठिठुरती सर्दी में बच्चे भी न जाने क्यों पैदा होते हैं, वो भी रात को." मन ही मन बोली.
"कौन है?" रजाई में से इतनी ठंड में बाहर निकलने को उसका दिल नहीं किया, इसलिए उसने रजाई में से केवल मुंह निकाला और पूछा.
"मैं हूं पंडित रामप्रसाद." बाहर से आवाज आई.
"ओह पंडित जी! अभी आई." वह फौरन न चाहते हुए भी रजाई की गर्मी से बाहर निकली और दरवाजे की सांकल खोल दी, "पाए लागे पंडित जी! कहो, इतनी रात गए कैसे आना हुआ?"
"पंडिताइन के तकलीफ हुई है. तुझे जल्दी चलना होगा." पंडित रामप्रसाद ने याचना की मुद्रा में कहा. उनके चेहरे पर परेशानी के चिह्न साफ नजर आ रहे थे.
"भगवान सब भली करेंगे. मैं अभी आई." कहते हुए वह अन्दर गई और बेटे को झकझोरा.
"क्या है, क्यों परेशान करती है अम्मा." उसके बेटे ने करवट बदली.
"मैं पंडित रामप्रसाद के यहां जा रही हूं. सांकल लगा ले."
"हुं हूं!" वह अलसाया उठकर बैठ गया.
पंडित रामप्रसाद अपनी टार्च से रोषनी बिखेरते आगे-आगे चले, रामदुलारी पीछे-पीछे.कम्बल पंडित रामप्रसाद ने भी ओढ़ा हुआ है और रामदुलारी ने भी. फिर भी सर्द हवा के बर्फ से भी ठंडे थपेड़े दोनों की कंपकंपी छुड़ा रहे थे.
रामदुलारी इस आधुनिक प्रशिक्षित दाइयों के युग में भी गांव भर की जानी-पहचानी अकेली दाई है. उसने यह काम अपनी सास से सीखा है. उसकी सास भी गांव में दाईपने का काम करती थी, पर उनका इतना नाम नहीं था.
दाईपने में रामदुलारी अपनी सास से भी दो हाथ आगे निकली. इसलिए जहां उसकी सास को केवल गांव के लोग जानते थे, वहीं रामदुलारी का नाम सफल, अच्छी दाई के रूप में आस-पास के गांवों से लेकर दूर-दूर के गांवों में भी है. उसके हाथ में कुछ ऐसा हुनर है कि प्रषिक्षित दाई भी उसके सामने बौनी साबित हो.
रामदुलारी अपने हुनर और अनुभव के आधार पर पीड़ित महिला के दुःख को कम करते हुए इस तरह से बच्चा जनाती है कि सभी वाह किए बिना नहीं रहते.महिला सहित सभी आभार व्यक्त करते.
उसका परिवार खास बड़ा नहीं है. एक लड़का था रामगोपाल. 9वीं कक्षा में पढ़ता. लड़की भी थी, जिसकी षादी उसने दो वर्ष पूर्व कर दी थी.
रामदुलारी के पति दीना का देहांत 5 वर्ष पहले देहांत हो गया. घर में अब केवल दो प्राणी, जिनका खर्चा दाईपने से भली-भांति जाता. घरों में सफाई का काम करना उसकी मजबूरी थी, क्योंकि दाई का काम भी प्रतिदिन थोड़ी होता है. इसका भी एक तरह से सीजन सा आता है. कभी-कभी तो दो-दो, तीन-तीन महीने काम नहीं आता. ऐसे आड़े वक्त काम वाले घर ही काम आते.
काम तो वह चार-पांच घरों में ही करती, लेकिन इस 40 साल की उम्र में लम्बे-चैड़े आंगनों में झाड़ू से झाड़ना उसकी कमर दुःखा देता. ऊपर से गांव के बाहर बने घूरे पर ढोर-डंगरों का गोबर और उनके घर का कूड़ा फैंकना उसे बुरी तरह थका देता.
बदले में मिलती, रोज प्रत्येक घर से एक रोटी और 6 महीने बाद फसल पर थोड़ा सा अनाज. खुश होकर लोग उसे इनाम भी दे देते. लेकिन ज्यादातर उपहार जैसे धोती, बर्तन उसके पास रहते नहीं.
जब भी उसकी बेटी आती, उनमें से काफी कुछ वह उसे देती. कुछ अपनी देवरानी, जेठानी व उनकी बहुओं को भी दे देती. जब कभी वह खुद किसी को कुछ नहीं देती वे मांग भी लेतीं.
रामदुलारी बेशक गांव में से शादी-ब्याह, सगाई, प्रीति व मृत्यु भोज के समय जूठन तक ले आती हो, लेकिन बच्चा जनाने के बाद मिला अनाज खुद इस्तेमाल नहीं करती, क्योंकि वह षोबर का अनाज कहलाता था. वह उस अनाज का उपयोग दुकान से दूसरा सामान घर के लिए खरीदने में करती है. इसी अनाज से रामगोपाल भी अपनी इच्छित वस्तु दुकान से खरीदता.
"आजा रामदुलारी!" पंडित रामप्रसाद ने लम्बे-चैड़े आंगन के लकड़ी के बड़े से दरवाजे को खोलते हुए कहा.
पंडित रामप्रसाद लम्बे-चैड़े आंगन को पार करता हुआ घर के दरवाजे के पास पहुंचा और दरवाज पर लगी लोहे की सांकल हिलाई.
"कौन?" अन्दर से पंडित रामप्रसाद की भाभी ने पूछा.
"खोलो भाभी, रामदुलारी आ गई है."
सुनते ही उसकी भाभी ने तुरन्त दरवाजा खोल दिया.
रामदुलारी को वैसे तो घर के नजदीक तक ही रहना पड़ता, लेकिन दाईपने के काम के समय लोग उसे घर के अन्दर तक ले जाते.
"जल्दी चलो रामदुलारी, वह बहुत तड़प रही है बेचारी." रामप्रसाद की भाभी ने कहा और लम्बे-लम्बे कदमों से अपनी धोती सम्भालती आगे चलने लगी. रामदुलारी ने भी अपनी चाल तेज कर दी, जिसके फलस्वरूप उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगी.
रामदुलारी रामप्रसाद की भाभी के पीछे-पीछे दो कमरे पर करती हुई तीसरे कमरे में पहुंची. वहां रामप्रसाद की पत्नी राधा बुरी तरह दर्द के मारे तड़प रही थी.
सर्दी के मौसम में भी उसके माथे पर पसीना साफ नजर आ रहा था.
"एक पतीली पानी गर्म करवाओ और एक तसले में उपलों का अलाव तैयार करवाकर यहां रख दो. हां, एक ब्लेड, साबुन और चिपटा जरूर लाना." रामदुलारी ने तुरन्त पंडित रामप्रसाद की पत्नी का अच्छी तरह से मुआयना करके कहा.
पंडित रामप्रसाद की भाभी फटाफट अन्दर गई. बताया गया सभी सामान तैयार किया और कमरे में ले आई,"रामदुलारी ब्लेड तो पुराना है."उसने ब्लेड रामदुलारी को दिया.
"कोई बात नहीं, चलेगा. इसे अलाव पर अच्छी तरह गर्म कर लो."रामदुलारी ने ब्लेड रामप्रसाद की भाभी को वापस दे दिया.
रामप्रसाद की पत्नी इस बार जोर की चीखी. रामदुलारी ने पंडित रामप्रसाद की पत्नी को सम्भाला और अपना काम करने लगी.
ब्लेड एक तरफ रखकर पंडित रामप्रसाद की भाभी भी पास आ गई. घबरा रही थी और जेठानी की तड़प उससे देखी नहीं जा रही थी, पर दिल मजबूत करके खड़ी थी.
कमरे में बिजली के बल्ब की व्यवस्था थी, पर बिजली न आने की वजह से मिट्टी के तेल की ढिबरी से कमरे में रोषनी की हुई थी.
"ऊं-आं, ऊं-आं........" कुछ देर में लिस-लिसा, चिप-चिपा, गोरा-चिट्टा फूल सा बच्चा रामदुलारी के हाथों में आ गया.
"लड़का हुआ है." मां की जिज्ञासा को रामदुलारी ने शांत किया.
पंडित रामप्रसाद की भाभी भी सुनकर पुलकित हो उठी,"लड़का हुआ है, लड़का." कहते-कहते उस कमरे से बाहर निकल गई और आंगन में खड़े होकर लड़के के जन्म की संदेष वाहक थाली जोर-जोर से बजाने लगी.
पूरा घर झूम उठा.
इधर रामदुलारी पैर फैलाकर जमीन पर अलाव के पास बैठ गई और गोद में नवशिशु को लेकर एक हाथ से उसका मुंह पकड़कर उसके गले में दो-तीन बार अंगुली डाल कर सादा गंद निकाला. उसका गला साफ किया.
जब भी रामदुलारी उस नवषिषु के गले में अंगुली डालती, बच्चा जोर-जोर से, "ऊं आं......" करता हुआ रोता.
फिर रामदुलारी ने उसकी लम्बी सुंडी (नाल) ब्लेड से काटी और कमरे के दरवाजे के पास खुर्पी से जमीन खोद कर गाड़ दिया.
रामप्रसाद ने लड़के के जन्म की खुशी में रामदुलारी को पांच किलो गेहूं, कुछ गुड़ और 51 रुपये तथा एक सूती धोती दी.
रामदुलारी कुछ दिन तक रोज पंडित रामप्रसाद के घर अन्दर तक जाती, बच्चे को और उसकी मां को नहलवाती.
पंडित रामप्रसाद का वह बच्चा अब 5 साल का हुआ. बहुत शरारती था.
रामदुलारी जब भी वहां काम करने जाती और वह बच्चा नजर आ जाता तो उसे बड़े प्यार से देखती. उस पर उसकी ममता उमड़ती, पर चाहकर भी वह उसे गोद में नहीं उठा पाती.
"मुन्ना पीछे हो जाओ." एक दिन उस बच्चे ने उसकी धोती पकड़ने की कोषिष की.
”मैं तुम्हारे साथ खेलंूगा."
"क्या.....!" वह पीछे हटी और जोर से हंसी, "क्या मेरे साथ खेलोगे, कैसी बात करते हो मुन्ना. जाओ अन्दर." रामदुलारी ने झाड़ू लगानी बन्द कर दी.
"नहीं, मैं तो तुम्हारे साथ खेलूंगा." उसने बाल हठ दिखाई और रामदुलारी के नजदीक आने लगा.
"मुन्ना, यह क्या!" पंडित रामप्रसाद की पत्नी ने तेज आवाज में कहा.
वह घर के द्वार से तेजी से बच्चे के पास आई और उसे गोदी में उठा लिया, "अभी उससे छू जाते तो दुबारा नहलाना पड़ता."
पंडित रामप्रसाद की पत्नी कहते-कहते घर के द्वारा की तरफ बढ़ गई. रामदुलारी के सीने में एक कांटा-सा चुभ गया.
-कैलाश चंद चौहान
कैलाश चंद चौहान ब्लॉग
Thursday, June 10, 2010
Friday, May 8, 2009
जिस बीमारी का ईलाज एलोपैथी में नहीं, होमियोपैथी में है
यह तो बहुत से लोगों को कि काफी बीमारियों का ईलाज एलोपैथी चिकत्सा पद्धति में नहीं है, बहुत से डॉक्टर प्रयोग करने के सिवा कुछ नहीं करते जबकि होमियोपैथी से वह ठीक हो सकते थे। भारत अभी वो सोच पनप भी नहीं पाई है कि अगर किसी चिकित्सा पद्धति से ईलाज संभव नहीं है तो डॉक्टर दूसरी पद्धति से ईलाज करने की सलाह मरीज को दे सके । यह कमी सभी पद्धति के चिकित्सकों में है। हालाँकि ऐसी सोच चिकित्सकों में पनप जाए तो मरीजों का बहुत भला हो. जैसे संकट / एमरजैंसी में एलोपैथी चिकित्सा में ग्लूकोज, इंजेक्शन के मरीज को बहुत जल्दी और अधिक आराम पहुँचाया जा सकता , मौत के मुंह से बचाया जा सकता है। उसके बाद बीमारी को ख़त्म करने के लिए होम्योपैथी का इस्तेमाल किया जा सकता है।
It's a lot of people a lot of diseases that allopathic treatment Ciktsa is not in the system, many doctors do not do anything except to use Homeopathy when he could be fine. India right now they could not even think of building up a system of medicine that if treatment is not possible with the other method of treatment to the doctor's advice to give to the patient. The shortage of doctors in the system. However, the building up in the doctors think that patients are very good. Such as crisis / Mrjansi in allopathic medicine in glucose, injection of the patient more comfortable very quickly and can be delivered, saved from death can be. After the illness of the end for homeopathy can be used
It's a lot of people a lot of diseases that allopathic treatment Ciktsa is not in the system, many doctors do not do anything except to use Homeopathy when he could be fine. India right now they could not even think of building up a system of medicine that if treatment is not possible with the other method of treatment to the doctor's advice to give to the patient. The shortage of doctors in the system. However, the building up in the doctors think that patients are very good. Such as crisis / Mrjansi in allopathic medicine in glucose, injection of the patient more comfortable very quickly and can be delivered, saved from death can be. After the illness of the end for homeopathy can be used
Subscribe to:
Posts (Atom)